China vs Japan: 19वीं शांगरी-ला वार्ता 12 जून को सिंगापुर में संपन्न हुई। सम्मेलन में जापानी प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा के मुख्य भाषण का जापानी मीडिया ने चीन पर उंगली निर्देशित करने के रूप में मूल्यांकन किया, और कहा कि उन्होंने सैन्य, आर्थिक आदि क्षेत्रों में चीन का सामना करने का अपना इरादा स्पष्ट कर दिया।

यह दूसरी बार है जब Japan ने शांगरी-ला वार्ता में मुख्य भाषण देने के लिए प्रधानमंत्री स्तरीय प्रतिनिधि को भेजा है। पहली बार साल 2014 में था, जब तत्कालीन जापानी प्रधानमंत्री शिंजो अबे ने सम्मेलन में China पर हमला किया था। 8 साल पहले अबे द्वारा दिए गए मुख्य भाषण की तुलना में, इस बार किशिदा के भाषण ने न केवल राजनीतिक, सैन्य, आर्थिक आदि क्षेत्रों से चीन को निशाना बनाने की वकालत की, बल्कि अन्य एशियाई देशों को सैन्य खर्च बढ़ाने का दावा करते हुए चीन का मुकाबला करने के लिए उकसाया। उधर, जापानी रक्षा मंत्री किशी नोबुओ ने अपने भाषण में किशिदा के कथन को दोहराया और खासकर थाईवान मुद्दे पर सैन्य टकराव का रवैया दिखाया है।

वर्तमान में, अमेरिका तथाकथित हिंद-प्रशांत रणनीति को लागू कर रहा है, जिससे कुछ जापानी राजनीतिज्ञों को लगता है कि उन्हें China को चुनौती देने, सैन्य शिथिलता हासिल करने और एशिया में आधिपत्य प्राप्त करने का अवसर मिल गया है। लेकिन साथ ही, उन्होंने देखा कि एशियाई मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए अमेरिका पहले की ही तरह ज्यादा ताकतवर नहीं रहा। इस तरह वे एशियाई एजेंट के रूप में अमेरिका की सेवा करने लगे हैं।

किशिदा ने शांगरी-ला वार्ता में अपने भाषण में अगले वर्ष तथाकथित हिंद-प्रशांत शांति योजना शुरू करने की घोषणा की, जिसका उद्देश्य राजनीतिक, आर्थिक, राजनयिक, सैन्य, औद्योगिक श्रृंखला आदि क्षेत्रों में चीन को रोकना है। उन्होंने किशी नोबुओ के साथ मिलकर अपने-अपने भाषण में तथाकथित यूक्रेन का आज पूर्वी एशिया का कल हो सकता है को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया और थाईवान के खिलाफ बल प्रयोग न छोड़ने के लिए चीन पर हमला किया, जिसका उद्देश्य जापान के लिए सैन्य खर्च बढ़ाने, शांतिवादी संविधान में संशोधन करने और एशिया में सैन्य टकराव करने के लिए बहाना खोजना है।

इसके अलावा, शांगरी-ला वार्ता में जापान ने दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के साथ सैन्य आदान-प्रदान को मजबूत करने, सैन्य सहायता प्रदान करने आदि का भी दावा किया, ताकि चीन का सामना करने वाले अधिक देशों को आकर्षित किया जा सके। नतीजतन, वह फिर भी विफल हुआ।

उदाहरण के लिए, इंडोनेशियाई रक्षा मंत्री प्रबोवो सुबियानतो ने शांगरी-ला वार्ता में कहा कि इंडोनेशिया सभी बड़े देशों का सम्मान करता है, इसलिए वह किसी भी सैन्य गठबंधन में भाग नहीं लेगा। उधर, मलेशियाई रक्षा मंत्री हिशामुद्दीन हुसैन ने भी अपने भाषण में इस बात पर जोर दिया कि आसियान अपना रास्ता खुद तय करेगा। इसके साथ ही अन्य दक्षिण पूर्व एशियाई देशों ने भी अपना-अपना ²ष्टिकोण व्यक्त किया है कि वे पक्ष नहीं चुनेंगे। इतिहास में कई एशियाई देशों को जापानी साम्राज्यवाद द्वारा जहर दिया गया है, और वे स्वाभाविक रूप से कुछ जापानी राजनितिज्ञों की गुप्त मंशा जानते हैं।

मौजूदा शांगरी-ला वार्ता के सह-आयोजकों में से एक के रूप में, Japan के असाही शिंबुन ने 12 जून को मई के अंत में जापानी विदेश मंत्रालय द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के परिणामों का हवाला देते हुए कहा कि आसियान देश आमतौर पर मानते हैं कि चीन इस क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण भविष्य का भागीदार है, जो जापान और अमेरिका से अधिक है।

चीन का विकास खतरे के बजाय एक अवसर है। यह अधिकांश एशियाई देशों की आम सहमति है, जिसे जापानी राजनीतिज्ञ उकसा नहीं सकते। लेकिन वे नाटो के एशिया-प्रशांतीकरण को बढ़ावा देने, और चीन के खिलाफ व्यापक टकराव की वकालत करने के लिए एशिया में अमेरिका के मोहरे बनना चाहते हैं। उन्होंने एक बार फिर सैन्यवाद के नुकीलेपन को उजागर किया, और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और क्षेत्रीय शांति व स्थिरता को गंभीर रूप से खतरे में डाल दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पूर्ण रूप से विफल होने का सबक अब दूर नहीं रहा है, लेकिन जापानी राजनीतिज्ञ चीन के खिलाफ खराब योजना बना रहे हैं, उनकी कार्रवाइयां एक बार फिर जापान को रसातल में ले जाएंगी।

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