मसूरी में मरोज त्यौहार की घूम

मसूरी ओर आसपास के संपूर्ण जौनपुर, रवांईं और जौनसार बाबर क्षेत्र में माघ के महीने की शुरूआत से मनाया जाने वाला मरोज त्यौहार का मंकर संक्राति से शुरू हो गया हैं. जिसमें प्रत्येक परिवार में वर्षभर से पाले गये बकरे को विधिवत पूजा अर्चना के बाद काटा गया. जौनपुर, रवांईं और जौनसार बाबर के प्रवासियों का मरोज त्यौहार मनाने के लिए अपने गावों को लौटना शुरू हो गये हैं. प्राचीन काल से ही मरोज त्यौहार मनाने की परंपरा है जो पूरे माघ माह के दौरान ग्रामीण इस मरोज त्यौहार का दावतों के साथ आनंद लेते हैं.

मसूरी के बंगो की कांडी गांव के ग्रामीण जब्बर वर्मा ने बताया कि प्रत्येक परिवार लगभग एक साल पहले से ही मरोज के लिए बकरा पालना शुरू करता है और जो परिवार बकरा पाल नहीं सकता हैं. वह मरोज से पहले ही अपनी सामथ्र्य के अनुसार खरीद लेता हैं. मकर संक्रांति में मरोज के दिन बकरे को घर के अंदर ला कर उसके ऊपर परिवार के सभी सदस्य जिंदौ और पानी के छींटे डालकर अपने ईष्टदेव को याद करते हैं. अगर बकरा अपने कान और पूरा शरीर एक झटके में हिला देता है तो यह माना जाता हैं कि ईष्टदेव ने दी जाने वाली बलि स्वीकार कर ली हैं. फिर बकरे को पांडव मंदिर में लाकर काटा जाता है और उसके मांस के छोटे लंबे टुकड़े कर घर के अंदर रस्सी के सहारे लटका दिए जाते हैं और अपनी सुविधानुसार पूरे माघ महीने में उसका इस्तेमाल उसका खाया जाता हैं. कुछ साल पहले घर की ब्याहता बेटियों को माघ का उसके हिस्से का बांटा उसके ससुराल में पहुंचाने जाता हैं. वहीं सभी रिश्तेदारों को माघ महीने में बुलाकर उनकी आवभगत की जाती हैं.

मरोज त्यौहार मनाने के लिए एक मान्यता के अनुसार जौनपुर, रवांईं और जौनसार बाबर के निवासी अपने आप को पांडवों का वंशज मानते हैं और हर गांव में एक पांडव का मंदिर हैं. जो इसका पुख्ता प्रमाण हैं. प्रत्येक त्योहार मनाने से पहले पांडव मंदिर में पूजा होती हैं. मान्यता के अनुसार पाण्डव जुए में कौरवों से जब द्रौपदी को हार गये थे तो दुरूशाासन और दुर्योधन ने द्रौपदी का चीर हरण कर किया था और द्रौपदी ने भरी सभा में अपने केश खोलते हुए शपथ ली थी कि दुशासन का मार के खून से केश धोने के बाद ही वह अपनी वेणी गूंथेंगी. मरोज त्यौहार के दिन घर की वरिष्ठ महिला बकरा कटने के बाद ही पूजा अर्चना करने के बाद अपने केश की वेणी गूंथती हैं.

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