मसूरी में पहली बार ऐतिहासिक नाटक का मंचन

25 दिसंबर को शुभारंभ होने वाले मसूरी विंटर लाइन कार्निवाल के पहले दिन पर्वतीय नाट्य मंच मुंबई की ओर से ऐतिहासिक नाटक का मंचन किया जाएगा. जिसके लेखक बलदेव सिंह राणा ने कहा कि माधोसिंह भंडारी की गाथा उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर हैं. जिन्होंने क्षेत्र के विकास के लिए अपने बेटे का बलिदान दे दिया था.

लेकिन आज की युवा पीढ़ी को इस महान वीर के बारे में शायद पता ही नहीं है. बलदेव राणा ने कहा कि पर्वतीय नाट्य मंच मुंबई के अथक प्रयास से माधोसिंह भंडारी की जीवनी पर आधारित नाटक को देश के विभिन्न भागों में मंचित किया जा रहा हैं. बताया कि माधोसिंह भंडारी नाटक में 70 कलाकार अपने अभिनय से नाटक को सजीव करने का प्रयास करेंगे. कार्यक्रम के सयोजक राजेन्द्र रावत ने बताया कि मसूरी में यह नाटय मंचन पहली बार आयोजित हो रहा हे तो मसूरी के लिये गर्व कि बात हैं. उन्होने कहा कि भविश्य में यह कार्यक्र माधो सिंह भंडारी के मलेथा के खेतों में आयोजित करने का प्रयास किया जायेगा. उन्होंने बताया कि माधो सिंह भंडारी, जिन्हें माधो सिंह मलेथा भी कहा जाता है, उनका जन्म सन 1585 के आसपास उत्तराखंड राज्य के टिहरी जनपद के मलेथा गांव में हुआ था और उनके प्रयास व बालिदान के कारण ही आज भी मलेथा गांव समृद्ध व हरा भरा है. लेकिन उस गांव के लोग अभी भी अपने नायक माधो सिंह को नहीं भूले हैं और वह माधों सिंह द्वारा बनायी गयी नहर आज तकरीबन चार सौ सालों बाद भी मलेथा तक पानी पहुंचा रही हैं.

मलेथा में सुरंग की कहानी

एक बार छुट्टियों में जब वह अपने गांव मलेथा आये तो वहां उन्हें वह स्वादिष्ट भोजन नहीं मिला, जिसको वह राज-महल में पाने के आदि थे. वह अपनी पत्नी पर गुस्सा हुए और उन्होंने अच्छा भोजन मांगा जबाब में पत्नी नें उन्हे वे सूखे खेत दिखा दिये जो पानी के अभाव में अनाज, फल व सब्जियां उगाने में असमर्थ थे. माधों सिंह बैचेन हो गये और उन्होनें निश्चय किया किसी भी तरह मलेथा गांव में पानी लेकर आयेंगे. गांव से कुछ दूर चन्द्रभागा नदी बहती थी, लेकिन नदी व गांव के बीच में बड़े-बड़े पहाड़ व चट्टानें थीं. लेकिन माधों सिंह ने विचार किया कि अगर किसी प्रकार पर्वतीय नदी के मध्य आने वाले पहाड़ के निचले भाग में सुरंग निर्माण की जाये तो नदी का पानी गांव तक पहुंचाया जा सकता हैं. दृढ़ निश्चयी माधो सिंह ने सुरंग खोदने वाले विशेषज्ञों व गांव वालों को साथ लेकर काम शुरु कर दिया. महीनों की मेहनत के बाद सुरंग तैयार हो गयी। सुरंग के ऊपरी भाग में मजबूत पत्थरों को लोहे की कीलों से इस प्रकार सुदृढ़ता प्रदान की गयी कि भीषण प्राकृतिक आपदा का भी उन पर प्रभाव नहीं पड़ सके.

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