मसूरी में लोक गायक प्रीतम भरतवाण की पत्रकार वार्ता

सात समंदर पार अमेरिका की धरती पर अपने सुरों का जादू बिखेर कर और मूल जागर, ढौल सागर का अपना बांटकर कर लौटे गजल सम्राट लोक गायक प्रीतम भरतवाण ने स्वदेश पहुंचने उत्तराखंडी लोक संस्कृति के प्रति विदेशियों में बढ़ते आकर्षण को सराहते हुए अपने अनुभव बांटे. भरतवाण ने अमेरिका की सिनसिनाटी यूनिवर्सिटी, इलीनीयो यूनिवर्सिटी, सिकागो, नॉर्थ केरिलोना और ओकला होमा यूनिवर्सिटी के करीब डेढ़ हजार छात्र छात्राओं को ढ़ोल, दमौ, डौंर, हुड़का थाल, जागर की खूबियों से रूबरू कराया और उन्हें प्रशिक्षण दिया. 18 फरवरी से अमेरिका प्रवास पर गए भरतवाण छह मार्च को उत्तराखंड लौटे. उन्होंने हिमालय केदारखंड की लोक विधा पर सोध कर रहे दर्जनों छात्रों का भी मार्गदर्शन किया. लोक संस्कृति के प्रति उत्तराखंड की सरकार की उपेक्षा का दर्द बयां करते हुए भरतवाण ने उत्तराखंडी लोकविद्या को पाठ्यक्रम में शामिल करने और इससे जुडे़ समाज को सरकारी नौकरियों में अलग से आरक्षण का प्रावधान करने की पैरवी की.
जागर सम्राट प्रीमत भरतवाण ने 17 दिनों के अमेरिका प्रवास के दौरान अपने अनुभव साझा करतेु हुए पत्रकारों को बताया कि सात समंदर पार हिमालयी संस्कृति, खासकर उत्तराखंडी लोक संस्कृति के प्रति छात्र-छात्राओं में खासी रूचि है. प्रवासी भारतीय भी अपनी संस्कृति के प्रति खासे जागरूक हैं. भरतवाण ऐसे दर्जनों छात्र-छात्राओं के लिए भी मददगार बने, जो ढ़ोल, दामौ, जागर आदि वाद्ययंत्रों पर शोध कर रहे हैं. विदेश धरती पर लोक संस्कृति के प्रति आकर्षण के गदगद भरतवाण ने बताया कि अमेरिकन यूनिवर्सिटी में छात्रों की सीखने की जबरदस्त रूचि और क्षमता है. कई छात्रों ने भविष्य में उत्तराखंड आने की इच्छा भी जताई है. बकौल भरतवाण, अमेरिका जाने का उनका मकसद मूल जागर और ढ़ोल सागर के छात्र-छात्रों को व्याख्यान देना था. भरतवाण ने लोकविद्या खासकर लोक गायकी और वाध्य यंत्रों को पाठ्यक्रम में शामिल करने और इस विद्या से जुड़े समाज को सरकारी नौकरी में आरक्षण का प्रावधान करने का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया. कहा कि जब तक लोकविद्या धरी समाज को सम्मान और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जाती तब तक लोक संस्कृति का संरक्षण संभव नहीं है.
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उत्तराखंड सरकार द्वारा आए दिन हो रहे आयोगों के गठन और उनकी कार्यशैली पर तंज कसते हुए भरतवाण ने कहा कि ये आयोग नहीं, बल्कि यहां की जनता के लिए रोग बनते जा रहे हैं. पहाड़ की संस्कृति, परंपरा, संसाधन और यहां की जवानी को बचाने के लिए प्रदेश सरकार को ठोस नीति बनाने की जरूरत है, वरना वह दिन दूर नहीं, जब पहाड़ और पहाड़ी बर्बाद होते दिखेंगे. अपने भावी विदेशी दौरों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि विदेशो में लोक संस्कृति का प्रचार-प्रसार वह जारी रखेंगे.

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