पक्ष-विपक्ष और दलितों पर दंगल, दांव पर लगा 2019

बीते कुछ दिनो में देश में दलितों के मुद्दे को लेकर कई छोटे-बड़े प्रदर्शन हुए, लेकिन हाल में एससी/एसटी अत्याचार निवारण कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद से देश में दलित राजनीति उफान पर है। देश के मुख्य विपक्ष पार्टी कांग्रेस पुरे जोर-शोर से दलितों पर अत्याचार के मुद्दे को उठा रही है जिसके कारण सत्ता पक्ष को जबरदस्त रोश का सामना करना पड़ रहा है। अप्रैल की शुरूआत में कई दलित संगठनों ने दलितों पर हो रहे अत्याचारों के ख़िलाफ़ 2 अप्रैल को प्रदर्शन किया। जिस के बाद देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन हुए और कुछ जगहों पर हिंसा की घटनाएं भी हुईं। हज़ारों लोगों ने इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा भी लिया और मांग की कि इस एससी/एसटी अत्याचार निवारण कानून को ना बदला जाए। आशंका यह जताई जा रही है कि इस क़ानून में बदलाव होने से दलितों के प्रति भेदभाव और उत्पीड़न के मामले बढ़ जाएंगे। हालांकि कांग्रेस को इसी मुद्दे को मिशन 2019 को लेकर सबसे बड़ा दांव खेलने का मौका मिल गया। दलितों पर हो रहे कथित हमलों को लेकर राहुल गांधी समेत कांग्रेस के नेता अनशन से लेकर संविधान बचाओ अभियान के जरिए राजनीति साधने में जुट गए हैं, और हों भी क्यों ना, सवाल जो 2019 जीतने का और नवनिर्वाचित कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के कुर्सी पर बिठाने का है। हालांकि कांग्रेस इसे सिर्फ विचार और सिधांतों की लड़ाई बता रही है।

क्यों है दलित राजनीति के केंद्र में ?

दरअसल आज दलित और दलितों के मुद्दे राजनीति के केंद्र में इसलिए खड़े हैं क्योंकि 2014 चुनाव में बीजेपी को मिली ऐतिहासिक जीत ये साबित करती है की दलितों औऱ अन्य पिछड़े वर्गों ने अपने पारंपरिक पार्टी को छोड़ कर बीजेपी को वोट दिया और यही डर 2019 को लेकर विपक्ष को सता रहा है। 2014 में दलितों का अपने पारंपरिक पार्टियों से मोहभंग होने भर से सारे राजनीतिक समिकरण बदल गए थे और किसी भी किमत पर 2019 में बीजेपी को रोकने पर उतारू विपक्ष ऐसी गलती दुबारा नही होने देना चाहती। यही कारण है कि दलितों पर राजनीति आज सबसे बड़ा मुद्दा है।

भाजपा और संघ को पता है की किस तरह 80 के दशक में संघ ने दलित बस्तियों में मिशनरियों की पैठ और बड़े पैमाने पर हो रहे धर्मान्तरण की घटनाओं को देखते हुए दलितों के बीच पकड़ व पैठ बढ़ाने का अभियान शुरू किया था। तब जाकर 1996 में दलित वोटों में भाजपा की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत के आसपास हुई थी जिसे एक बड़ी कामयाबी के तौर पर देखा जा रहा था। 2014 में यह वोट प्रतिशत लगभग दोगुनी हो गई और बीजेपी के सामने दूर-दूर तक कोई दूसरा प्रतिद्वंदी नहीं था। लेकिन मौजुदा हालात 2019 में बीजेपी के सारे समीकरण बिगाड़ कर रख सकती है और इसी बात को लेकर भाजपा चिंतित है।

बीजेपी, संध की रणनीति

दलितों को आकर्षित करने के लिए भाजपा जी जान लगा रही, भाजपा को पता है की 2019 का किला फतह करना दलित और पिछड़ों के वोट के बिना मुमकिन नहीं है। इसलिए इसी क्रम में बीजेपी के कई नेता दलितों को रिझाने में लगे हैं। बीते दिन यूपी के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने दलित परिवार के यहां भोजन किया तथा चौपाल लगाकर स्थानीय लोगों की समस्याओं को सुना रात्रि विश्राम भी उपमुख्यमंत्री उसी गांव में कर रहें। तो वही कई केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ नेता भी प्रधानमंत्री के विशेष दूत बन कर विपक्ष की काट के लिए गांव-गांव दौरा शुरू कर दिया है। हालांकि विपक्ष से चुनौती झेल रही बीजेपी को अंदरूनी विरोध का भी सामना करना पड़ रहा है। पिछले कुछ दिनों में कई दलित सांसदों ने दलितों पर अत्याचार के सिलसिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर अपनी नाराजगी जताई है। इनमें नई दिल्ली के उत्तर पश्चिम से उदित राज समेत उत्तर प्रदेश के चार सांसद शामिल हैं। जिन्हें मनाना भाजपा के लिए कठिन चुनौती है।

हालांकि मौजुदा समय में सरकार के लिए परेशानियां कम होती नजर नही आ रही है। अमेरिकी सरकार द्वारा गठित एक आयोग के रिपोर्ट ने भारत सरकार समेत संघ की चुनौतियों को और बढ़ा दिया है। यूएस कमीशन फॉर इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम ने अपनी रिपोर्ट में दलितों के विरुद्ध हिंसा, धमकी और उत्पीड़न के मामलों में बढ़ौतरी की बात कही गई है। वो भी ये रिपोर्ट उस समय आई है जब सरकार वैसे ही विपक्ष द्वारा दलित, गरीबों और कमज़ोरों के उपर हो रहे अत्याचार का आरोप झेल रही है।

क्यों दलितों को मनाना है बड़ी चुनौती ?

दरअसल सरकार और आरएसएस को पता है की उसे लगातार चुनाव जीतते रहने के लिए नए वोटर चाहिए। लेकिन मुस्लिम समाज की तरह दलित भाजपा को अछूत नहीं मानते इसलिए उसने वहां बड़ी संभावना दिखाई देती है। लेकिन जब बीजेपी के लिए उसके पुराने वोटर (अगड़े) नई उम्मीदों से टकराने लगी है तो ऐसे में बीजेपी इस हालत को कैसे संभालेगी, ये एक बड़ी चुनौती है। अब चाहे वो मामला हैदराबाद यूनिवर्सिटी में दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या का हो या गुजरात के उना जिले में दलित युवक की पिटाई और उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में पिछले साल हुई जातिगत हिंसा के बाद भड़के दलित प्रदर्शनकारी की हो। 2019 चुनाव को जीतने की मंशा से उतरने वाली सभी पार्टियों को पता होना चाहिए की चुनाव परिणाम को लेकर पढ़े-लिखे दलित युवा निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। तभी डैमेज कंट्रोल की कोशिश में जुटी भाजपा बाबा साहब आंबेडकर की जयंती पर कार्यक्रम को लेकर जोर शोर से लगी रही। पीएम मोदी नें इस मौके पर जहां बाबा साहब के अहम योगदान की याद दिलाई तो दुसरी और कांग्रेस द्वारा बाबा साहेब की अनदेखी को गिनाया।


वैसे तो ये लड़ाई राजनीतिक है औऱ दलितों को साधने में कोई पार्टी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। दक्षिणी राज्य कर्नाटक में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं और यहां दलितों के खिलाफ बयानों से भाजपा के लिए कई मुश्किल खड़े हुए हैं। वहीं लोकसभा चुनाव में भी अब अधिक देर नहीं है ऐसे में कांग्रेस और भाजपा दोनों अधिक से अधिक लोगों का समर्थन जुटाने में लगी हैं।

जनहित खबर के लिए राहुल की रिपोर्ट

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