बसेगा पहाड़, बचेगा पहाड़: कविताओं ने बांधा समा, उत्साहित दिखे लोग, दिखी संस्कृति की झलक

नई दिल्ली। उत्तराखंड की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए आए दिन कोई प्रोग्राम किया जाता है। यहां की संस्कृति को देखने के लिए लोगों में हमेशा उत्साह बना रहता है। ऐसे में रविवार को दिल्ली के पुराना पालम रोड पर एक कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया है। शौकीन वाटिका ककरौला में इस सम्मेलन का आयोजन किया गया। जिसमें कई नाहमी कवियों ने हिस्सा लिया। इस सम्मेलन का आयोजन ‘खुदेड़ डांडी कांठी साहित्य एवं कला मंच’ द्वारा कराया गया जिसका शीर्षक ‘बसेगा पहाड़, बचेगा पहाड़’ दिया गया। इस सम्मेलन को सफल बनाने के लिए भारी मात्रा में लोगों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। यहां पर सबसे ज्यादा ध्यान पहाड़ की भाषा पर दिया गया। कवि सम्मेलन में कुमाऊ और गढ़वाली भाषा का काफी समर्थन किया गया।

इस सम्मेलन का संचालन नीरज बवाड़ी ने किया। सम्मेलन की शुरुआत गणेश वंदना गाकर की गई। सम्मेलन में कई मुद्दों पर बातचीत की गई। सबसे पहले सम्मेलन में 26/11 हमले को याद कर उसमें मरने वाले लोगों को याद किया गया। जिसके बाद संविधान निर्माताओं के बारे में बार की गई। कवि सम्मेलन में खारतौर पर गढ़वाल और कुमाऊ की स्थानीय भाषा के बारे में बात की गई। यहां पर इन भाषाओं के प्रति लोगों को उजागर किया गया। लोगों में कवि सम्मेलन का खूब सारा उत्साह देखा गया। भाषा के प्रति बात की जाए तो यहां पर दो बच्चियों को भी सम्मानित किया गया। दोनों को इस दौरान अवॉर्ड भी दिया गया। नन्ही प्रतिभाओं के बारे में स्टेज पर बताया गया कि भाषा के प्रति वह काफी उजागर हैं तथा गढ़वाली और कुमाऊ की भाषा में वह काफी अच्छी तरह कविताएं और गीत गाती हैं।

कविताओं के प्रति कुमाऊ और गढ़वाली भाषा को जिस खूबसूरती के साथ दर्शाया गया उसे देख कर लोगों में इस भाषा के प्रति खासा जोर देखा गया। इससे साफ हो जाता है कि भाषा के प्रति यहां के लोगों में कितना उत्साह है तथा वह अपनी भाषा से कितना प्रेम करते हैं। इस कवि सम्मेलन का आयोजन पहाड़ की संस्कृति को दर्शाने के लिए किया गया। सम्मेलन में मुख्य अतिथि के तौर पर पूरण चंद्र कांडपाल, सुमेश शौकीन और बिहारीलाल जालंधरी ने शिरकत की। इसके अलावा कई कवियों ने आकर यहां समा बांधा। सम्मेलन में कई सारे कवियों ने अपनी हिस्सेदारी दी। जिनमें प्रदीप सिंह रावत, संतोष जोशी, देवेश, उमाशंकर कपरुवान, बिरेंद्र जुयाल, गोविंद राम पोखरियाल अनूप रावत, भास्कर जोशी, ममता रावत, बेबी शगुन उनियाल, बेबी इशिता नेगी, नीरज बवारी, आशीष सुंदरीयाल, कमल रावत, रंजीत रावत, राजेंद्र सिंह रावत, सुरेंद्र रावत, सुरेंद्र सिंह लाटा, दीपक सिंह रावत, नीरू भदूला का नाम शामिल है।

कवि सम्मेलन में कई तरह की कविताएं सुनने को मिली। कुछ कविताएं तो ऐसी थी जिसे सनुने के बाद तालियों का शोर खत्म ही नहीं हो रहा था। नई-नई कविताएं सामने आने के बाद कार्यक्रम का स्तर लगातार चढ़ता ही चला गया था। यहां पर राजनीति से लेकर हास्य तक कविताएं पेश हुई। तरह तरह की कविताओं से उत्तराखंड के लोगों के बारे में तथा यहां की संस्कृति के बारे में लोगों को अधिक से अधिक जानकारी दी गई। यहां कविताएं खत्म होने के बाद लोगों में कवियों के साथ सेल्फी लेने की होड भी मच गई तथा लोगों ने यहां आकर कविताओं का खूब आनंद लिया। लेकिन जहां पर भी लोगों के उत्साह में कमी आई तो उसे कवि उमाशंकर की कविताओं ने पूरा कर दिया। बुझे हुए चेहरे यूं तो पूरे कवि सम्मेलन में कही पर भी दिखाई नहीं दिए लेकिन जहां पर भी लोगों के उत्साह में कमी आई तो उसे उमाशंकर की कविताओं ने पूरा किया। उमाशंकर की कविताओं ने लोगों को अपनी कुर्सी से खड़े होकर तालियां बजाने को भी मजबूर कर दिया।

अक्सर उत्तराखंड से पलायन का मुद्दा सामने आता है। ऐसे में पलायन के मुद्दे पर भी कवि सम्मेलन में खासा जोर दिया गया। कवि सम्मेलन में बताया गया कि अब उत्तराखंड में ऐसा काम हो रहा है जिससे पहाड़ के लोगों को पलायन करने की जरूरत ही नहीं होगी तथा पहाड़ की संस्कृति के साथ साथ यहां के लोगों भी आकर्षण का केंद्र बन जाएंगे। आपको बता दें कि रविवार का दिन काफी बड़ा दिन है। इस दिन 26/11 हमला हुआ था तथा संविधान के प्रति भी आज का दिन काफी अहम है। इन सभी मुद्दों को कवि सम्मेलन में उजागर किया गया। तथा आतंकवाद पर भी सभी को एकजुट होने की बात कही गई और बुराई को यहां से खत्म करने की बात कही गई। वही रविवार को पीएम मोदी का भी मन की बात कार्यक्रम था। पीएम मोदी ने भी अपने मन की बात कार्यक्रम में इन सभी मुद्दा को केंद्रित किया था।

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