वो 4 दलीलें जिससे फंसे पार्टी के 20 विधायक, राष्ट्रपति पर टिकी निगाहें

हमेशा सुर्खियों में रहने वाली दिल्ली में सत्ता रूढ़ आम आदमी पार्टी ने एक बार फिर से मीडिया की सुर्खियों में अपनी जगह बना ली है. चुनाव आयोग की तरफ से राष्ट्रपति से आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों को अयोग्य घोषित करने की सिफारिश कर दी गई है. जिसके बाद से ही राजनीति में भूचाल सा आ गया है. इस सब के बीच हमेशा होने वाला बयानबाजी का सिललिसा भी शुरु हो चुका है. एक तरफ तो आम आदमी पार्टी की तरफ से यह कोशिश लगातार की जा रही है कि वह किसी तरह से अपनी सत्ता को बचा ले तो दूसरी तरफ विपक्षी पार्टियों की तरफ से भी लगातार अपना रास्ता साफ करने की कोशिश की जा रही है.

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लेकिन इस सब के बीच राष्ट्रपति पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं. सभी राष्ट्रपति के फैसले का इंतजार कर रहे हैं. लाभ के पद मामले में लटकी आम आमदी पार्टी के विधायकों पर तलवार का फैसला राष्ट्रपति ही लेंगे. अगर राष्ट्रपति की तरफ से फैसला पार्टी पक्ष में नहीं आया तो विधायकों की संख्या इस वक्त जहां 66 है तो वह घट कर 46 ही रह जाएगी. इस मामले में एक एनजीओ की तरफ से हाईकोर्ट में इन नियुक्ति को चुनौती दी गई थी. इसमें कहा गया था कि पार्टी के 21 विधायकों की नियुक्ति को संसदीय सचिव के पद पर असंवैधानिक बताया गया था.

इस केस को वकील प्रशांत पटेल ने प्रस्तुत किया था. प्रशांत पटेल की तरफ से राष्ट्रपति के नाम पर एक याचिका को भी लगाया गया है. जिसके बाद से ही आम आदमी पार्टी को एक बड़े झटके का सामना करना पड़ रहा है. जो याचिका राष्ट्रपति को दी गई है उसमें कहा गया है कि संसदीय सचिव द्वारा सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल किया गया है. उन्हें मंत्री के ऑफिस में जगह दी गई है. ऐसे में वह लाभ के पद पर हैं. याचिका में कहा गया है कि संसदीय सचिव शब्द विधानसभा की नियमावली में नहीं है. इसमें मात्र मंत्री शब्द का ही जिक्र किया गया है. याचिका में यह भी कहा गया है कि कि संविधान अनुच्छेद 191 के तहत और राजधानी ऐक्ट 1991 की धारा 15 के अनुसार अगर किसी को भी लाभ का पद दिया जाता है तो उसकी सदस्यता रद्द कर दी जाती है.

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