क्या आज होगा फैसला ? जानिए क्या हुआ अभी तक

देश में लंबे समय से चर्चित राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद को लेकर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है. इस बहुचर्चित बुद्धि की सुनवाई चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई में 3 जजों की बेंच द्वारा की जाएगी अयोध्या के इस विवादित क्षेत्र क्षेत्र को लेकर लंबे समय से विवाद चलता रहा है. यह विवाद लगभग 68 सालों से कोर्ट में चल रहा है. ऐसे में बुधवार 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद विध्वंस की पच्चीसवीं वर्षगांठ भी है. इसको लेकर सरगर्मियां कहां पर ज्यादा तेज हो रखी है इस मुद्दे को लेकर दोनों पक्षों में बेचैनी का माहौल बना हुआ है लेकिन कहां जा रहा है कि इस मामले में अंतिम फैसला अगले साल तक किया पाएगा.

1528 में अयोध्या में मस्जिद का निर्माण हुआ था इस संदर्भ में कहा जाता है कि मुगल सम्राट बाबर रहे या मस्जिद बनवाई थी इसलिए इसका नाम बाबरी मस्जिद रख दिया गया लेकिन दूसरी तरफ हिंदू समाज के लोग उस क्षेत्र को भगवान राम का जन्म स्थान मानते हैं तथा क्षेत्र में राम मंदिर बनाना चाहते हैं.

1853 में क्षेत्र में सांप्रदायिक दंगे हो गए थे.

1859 विवादित क्षेत्र में बाड़ लगा दिया गया था यह बाड़ ब्रितानी शासकों द्वारा लगाया गया था तथा परिषद के अंदर वाले हिस्से में मुसलमानों और बाहरी हिस्से में हिंदुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दे दी गई थी.

1949 भगवान राम की मूर्ति को मस्जिद के अंदर पाया गया था जिसके बाद कहां जा रहा था कि कुछ हिंदुओं ने इस मूर्ति को चलाकी से मस्जिद के अंदर रख दिया है. इस मामले में मुस्लिम समुदाय की तरफ से विरोध देखा गया था और इस मामले को अदालत में दायर करा दिया गया था. जिसके बाद सरकार की तरफ से विवादित क्षेत्र में ताला लगा दिया गया था.

1984 विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व में कुछ हिंदुओं ने भगवान राम के जन्म स्थल पर भव्य राम मंदिर निर्माण करने की एक समिति का गठन किया था इस अभियान का नेतृत्व बीजेपी के प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी द्वारा किया गया था.

1986 फैजाबाद के जिला मजिस्ट्रेट ने हिंदुओं को प्रार्थना करने के लिए विवादित क्षेत्र में लगे ताले को खोल देने का फैसला किया था. जिसके बाद मुसलमानों की तरफ से भारी विरोध देखा गया था और मुस्लिम समुदाय की तरफ से बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन कर दिया गया था.

1990 विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं की तरफ से विवादित ढांचे को काफी भारी नुकसान पहुंचाया गया था. इस बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की तरफ से बातचीत के माध्यम को सुचारू किया गया था तथा इस मुद्दे को बातचीत के माध्यम से समझाने का प्रयास किया गया था लेकिन सारी कोशिशें विफल साबित हुई थी.

1992 बीजेपी विश्व हिंदू परिषद और शिवसेना के कार्यकर्ताओं की तरफ से 6 दिसंबर को विवादित ढांचे को ध्वस्त कर दिया गया था. लेकिन इसका परिणाम इतना घातक साबित हुआ था कि देश भर में हिंदू मुस्लिमों के बीच सांप्रदायिक दंगे शुरू हो गए थे इन सांप्रदायिक दंगों में 2000 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी.

2002 जनवरी तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेई की तरफ से अयोध्या समिति का गठन किया गया था और इस में वरिष्ठ अधिकारी शत्रुघ्न सिंह को हिंदू मुस्लिम नेताओं के बीच बातचीत करने का काम सौंपा गया था.

13 मार्च को कोर्ट की तरफ से कहा गया था कि अयोध्या में यथास्थिति बरकरार रखी जाएगी. 15 मार्च विश्व हिंदू परिषद और केंद्र सरकार की तरफ से एक समझौता हुआ जिसमें कहा गया था कि सरकार को मंदिर परिसर के बाहर शिलाएं सौंप देंगे. 22 जून को विश्व हिंदू परिषद ने एक बार फिर से मंदिर के निर्माण के लिए विवादित भूमि पर अपनी आवाज उठाई थी.

2003 जनवरी महीने में रेडियो तरंगों के जरिए यह पता लगाने की कोशिश की गई थी कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद परिषद के नीचे क्या कोई प्राचीन इमारत है या नहीं. लेकिन इसका कोई भी निष्कर्ष नहीं निकल पाया और अप्रैल महीने में इलाहाबाद कोर्ट की तरफ से पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने खुदाई की जिसमें मंदिर के अवशेष बरामद किए गए थे. लेकिन इसके बाद मई महीने में सीबीआई की तरफ से 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने मामले में डिप्टी पीएम लालकृष्ण आडवाणी सहित आठ लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था.

2006 जुलाई महीने में विवादित क्षेत्र पर अस्थाई राम मंदिर की सुरक्षा के लिए बुलेट प्रूफ कांच का खेरा बनाए जाने के प्रस्ताव को पास किया गया था.

2010 राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवादित क्षेत्र पर सुनवाई की गई थी और 8 सितंबर को अयोध्या विवाद पर 24 सितंबर को फैसला सुनाने की घोषणा की गई थी जिसके बाद 24 सितंबर को हाई कोर्ट के 3 जजों की बेंच ने फैसला सुनाया की हिंदुओं को जमीन दी जाएगी. लेकिन विवादित क्षेत्र का एक तिहाई हिस्सा मुसलमानों को मस्जिद बनाने के लिए भी दिया जाएगा पर यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया.

2017 सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचने के साथ ही मध्यस्थता की गई. तत्कालीन चीफ जस्टिस जेएस खेहर की तरफ से कहा गया कि अगर इस मामले में दोनों पक्ष राजी हो जाए तो कोर्ट के बाहर इस मामले को सुलझा लिया जाए

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